रविवार, अक्‍तूबर 30, 2005

वन्दे मातरम्

वन्दे मातरम्

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्यश्यामलां मातरम्॥

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्
पुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्॥

कोटि कोटि कन्ठ कलकलनिनाद कराले
कोटि कोटि भुजैर्धृतखरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम्॥

-बंकिम चंद्र चटर्जी

शुक्रवार, अक्‍तूबर 21, 2005

हिन्दी मै ब्लागिग कि शुरुवात

चलो भाई हिन्दी मै ब्लागिग कि शुरुवात कि जाये..
और फ़िर आइ. आइ. टी. का हिन्दी मित्र मन्डल, इससे अच्छा मन्च और क्या हो सकता है इस इच्छा को पूरी करने का//
और शुरुआत अगर इक कविता से हो तो सोने पे सुहागा..
मेरी नयी कविता..

मै इक बौना आदमी,
हा केवल इक आदमी हू.

नही मै उतरा फ़रिश्ता स्वर्ग का.
नही मै अवतार देवो का
भवनाओ का खिलौना ,
अनुभूतियो का जकडा
विवशताऔ से विवश
बन्दिशो से बन्धा,

इक बौना, केवल आदमी
धरती का बाशिन्दा
तन्हा, अकेला और इच्छाओ क पुतला ..

कितनी मुश्किल है अभिव्यक्ति,
मन चह्ता हैन छुपाना,
खुद को देवपुत्र बताना और
आन्खे बन्द कर लेना,
नही देखना , मुह फ़ेरना,
आखिर कैसे मानना
कि राछ्सो का अन्श है कही कोने मे,
छुपा हुआ , दुबका सा
कुलबुलाता, सिर उठाता और फ़िर दुबक कर, छिप कर सिमट जाता